Thursday, August 6, 2009

शब्दों मे

मैंने शब्दों में

भगवान को देखा

शैतान को देखा

आदमी तोबहुत देखे

पर

इंसान कोई कोई देखा।

इन्ही सब्दों में

मैंने प्यार को देखा

कदम कदम पर अंहकार भी देखा

धर्मात्मा तो बहुत देखे

पर

मानवता की खातिर

मददगार कोई कोई देखा।

इन्ही सब्दों में

मैंने चाह देखी

भगवान् पाने की

बुलंदियों पर जाने की

गिरते हुए भी मैंने बहुत देखे

पर गिरते को उठाने वाला

कोई कोई देखा।

इन्ही शब्दों में

भ्रष्टाचार को महिमा मंडित करते देखा

नारी की नग्नता को प्रदर्शित करते देखा

पर निर्लाजता पर चोट करते

कोई कोई देखा।

इन्हीशब्दों में

कामना करता हूँ इश्वर से

मुझे शक्ति दे

लेखनी मेरी चलती रहे

पर पीडा में लिखती रहे

पाप का भागी में banu

यश का भागी इश्वर रहे.

Saturday, August 1, 2009

मम्मी मुझे बताओ कैसे?

मम्मी मुझे बताओ कैसे?
कैसे आते आम पेड़ पर
और जमीन मे आलू
मम्मी मुझे बताओ कैसे
नाचे कूदे भालू?

कैसे आता चाँद गगन मे
और नीलगगन मे तारे
मम्मी मुझे बताओ कैसे
सूरज लाता भोर उजारे?

मैंने देखा चिडिया को
सुबह सवेरे आती
मम्मी मुझे बताओ कैसे
चिडिया इतना मीठा गाती?

कैसे बादल उडे गगन मे
फिर बरसी वरखा रानी
मम्मी मुझे बताओ कैसे
भीगे नाना नानी?
कैसे पंछी उडे गगन मे
और जमीन पर आते
मम्मी मुझे बताओ कैसे
पर्वत ऊँचे होते जाते?
डॉ अ किर्तिवर्धन
09911323732

Saturday, July 4, 2009

मेरी कविता

मेरी कविता
मेरी कविता
आँसू सम है
जो बिन नियम के चलते हैं
बस
भावों को दर्शाते हैं
बिना कहे शब्दों म कुछ भी
दिल के राज बता जाते हैं.
आँसू
बस
भावों की अनुभूति हैं
स्वयं रंग
कैनवास और कूची है.
वाही भाव
जब शब्दों मे आते हैं
शब्द ही रंग
और कूची बन जाते हैं
मेरे पन्नों के कैनवास पर

कविता बनकर
छा जाते हैं.
शब्द
स्वयं
कविता बन जाते हैं.
आ.कीर्तिवर्धन

Saturday, May 2, 2009

नया दौर

नए दौर के इस युग मे
सब कुछ उल्टा दिखता है
महँगी रोटी सस्ता मानव
गली-गली मे बिकता है।

कहीं पिघलते हिम पर्वत
हिमयुग का अंत बताते हैं
सूरज की आर्मी भी बढती
अंत जान का दीखता है।

अबला भी अब बनी है सबला
अंग प्रदर्शन खेल में
नैतिकता का पतन हुआ है
जिस्म गली मे बिकताहाई।

रिश्तों का भी अंत हो गया
भौतिकता के बाज़ार मे
कौन पिता और कौन है भ्राता
पैसे से बस रिश्ता है।

भ्रष्ट आचरण आम हो गया
रुपैया पैसा ख़ास हो गया
मानवता भी दम तोड़ रही
स्वार्थ दिलों मे दिखता है।

पत्नी सबसे प्यारी लगती
ससुराल भी न्यारी लगती
मात पिता संग घर मे रहना
अब तो दुष्कर लगता है।

पर्वत से वृक्षों का कटना
नदियों से जल का घटना
तनाव ग्रस्त मानव का देखो
जीवन संकट दीखता है।

डॉ अ कीर्तिवर्धन

नया दौर

मुझे इंसान बना दो

मुझे इंसान बना दो.____________________में हूँ बस आदमी,मुझे इंसान बना दोभटकता हूँ सब और,मुकाम बता दो.मिटटी के कण ,धूल हूँ,नहीं किसी काम कामुझको भी किसी नींव का,पाषाण बना दो.में हूँ बस आदमी,मुझे इंसान बना दो..बिखरा हूँ हर तरफ,नहीं कोई पहचान हैदीप बन जल सकूँ राह में,जलना सिखा दो.बूढा हुआ हूँ उम्र से,समय व्यर्थ गवायाँकाम आ सकूँ किसी के,कोई राह बता दो.में हूँ बस आदमी,मुझे इंसान बना दो..छल कपट मन मे भरा ,बस आदमी हूँ मेंदूब सा विनम्र ,पीपल सा महान बना दो.आंधियां जो गुजरें,उनके भी तलवे सहला सकूँइंसानियत की राह की,पहचान बता दो.में हूँ बस आदमी,मुझे इंसान बना दो..जीवन है व्यर्थ,गर आदमी बना रहाइंसान बन सकूँ,कोई तदबीर बता दो.भटका हूँ उम्र भर,मंजिल की तलाश मेंमुझको भी नदी की,एक धार बना दो.में हूँ बस आदमी,मुझे इंसान बना दो..नहीं चाह मेरी,में समंदर बन सकूँ,मीठा रहे पानी,कहीं प्यास बुझा दो.सूरज की गर्मी से जल,गर बादल बन गयाजन जन की प्यास बुझाने,धरती पर बरसा दो.में हूँ बस आदमी,मुझे इंसान बना दो..डॉ. अ.कीर्तिवर्धन a.kirtivardhan@rediffmail.coma.kirtivardhan@gmail.com
यह मेरी कविता है परन्तु कॉपी पेस्ट के कारण ऐसे ही लिखी गई है.
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